महामनुष्य बुद्ध

कथन

(क)

तथागत (बुद्ध) न देवता थे और न तो ईश्वर ही, वे भी हम-लोगों के समान मनुष्य थे। विद्वान् लेखक ने तथागत के जीवन-चरित्र को इसी मानवी दृष्टिकोण से आकर्षक शैली में लिखा है। इसे पाठकों के मनोरंजन के साथ ही ज्ञान-वर्द्धन भी होगा।

भिक्षु धर्मरक्षित, संपादक "धर्मदूत" सारनाथ, वाराणसी


(ख)

मेरे चिर-परिचित मित्र एवं काठमांडूँ (नेपाल) के एक सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं चिन्तक श्री धर्मरत्न यमि रचित इस पुस्तिका "महामनुष्य बुद्ध" को मैं एक मौलिक तथा गंभीर कृति मानता हूँ। पहले "धर्मदूत" में एक लेख माला के रूप में इसका प्रकाशन हुआ था और तभी मेरे मन में भी यह बात उठी थी कि किसी प्रकार इन लेखों को पुस्तक का रूप मिले तो अच्छा हो। यह पुस्तिका बड़ी ही महत्त्वपूर्ण है। श्री यमि जैसे गंभीर चिन्तक और सुधी साहित्यकार ही नेपाल और भारत का सांस्कृतिक सम्बन्धका सच्चा स्वरूप प्रस्तुत कर सकते हैं। इन की और इन के ही समान अन्य नेपाली साहित्यकारों की कृतियों का हिन्दी में प्रकाशन होने से हिन्दी साहित्य का बहुत उपकार हो सकता है।

१८—१२—२०१८ प्रो० राजनाथ पाण्डेय